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वक्त के नज़ाकत समझकर सियासत को ससम्मान अलविदा कह दें वीरभद्र, शांता और धूमल

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वक्त के नज़ाकत समझकर सियासत को ससम्मान अलविदा कह दें वीरभद्र, शांता और धूमल

वक्त के नज़ाकत समझकर सियासत को ससम्मान अलविदा कह दें वीरभद्र, शांता और धूमल
March 07
10:47 2018

वीरभद्र सिंह, शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के खिलाफ कुछ कहने में कलम कतरा जाती है। हो सकता है, कोई सहमत न हो, लेकिन इन तीनों को हम हिमाचल की राजनीति का बरगद यानी वटवृक्ष मानते हैं। वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्र में शिव का वास माना गया है। इस दृष्टि से प्रदेश की सियासत में वीरभद्र सिंह सिंह ब्रह्मा, शांता कुमार विष्णु और प्रेम कुमार धूमल शिव हुए। कथा के अनुसार विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ। उसी वक्त राजा मणिभद्र से बरगद का वृक्ष उत्पन्न हुआ। बरगद यानी वटवृक्ष को यक्षवास भी कहा जाता है, क्योंकि मणिभद्र यक्षों के राजा थे।

बरगद एक दीर्घायु विशाल वृक्ष है–निवर्तमान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी प्रदेश की सियासत में बरगद की तरह दीर्घायु हो गए हैं। यह भी माना जाता है कि प्रदेश में वीरभद्र सिंह ही काँग्रेस और काँग्रेस ही वीरभद्र सिंह हैं। उनका सियासी कद बहुत ऊंचा है, जनता में गहरी पैठ है, सबके साथ चले हैं, सबको साथ लेकर चले हैं। यही कारण है कि छह बार प्रदेश के सीएम रहे, कई बार पीसीसी के अध्यक्ष बने, इंदिरा गाँधी और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व-काल में केंद्रीय मंत्री भी रह चुके। 55-56 साल से सक्रिय राजनीति में हैं। सियासत का यह सफर कोई खेल-तमाशा नहीं है।
आज क्योंकि बात प्रदेश काँग्रेस की हो रही है, इसलिए बरगद के मध्य और अग्र भाग में बैठे विष्णु और शिव को वहीं छोड़ दे रहा हूँ। यह बात ब्रह्मा (वीरभद्र सिंह) से शुरू होती है।

कहते हैं कि वटवृक्ष के नीचे कुछ नहीं पनपता, बल्कि वटवृक्ष पनपने ही नहीं देता। प्रदेश काँग्रेस की राजीनीति में भी 1983 के बाद यही कुछ देखा गया। यत्र-तत्र-सर्वत्र वीरभद्र सिंह ही वीरभद्र सिंह। एक समय पूर्व मुख्यमंत्री ठाकुर राम लाल चुनौती बने, लेकिन प्रकृति ने साथ नहीं दिया। फिर पंडित सुख राम, जय बिहारी लाल खाची, श्रीमती विद्या स्टोक्स और आखिर में कौल सिंह ठाकुर अखाड़े में कूदे, लेकिन सब की शिकस्त हुई। वीरभद्र अजेय बने रहे। कहते यह भी हैं कि सराहन की कुल देवी माता भीमा काली उनके अंगसंग हैं।
पर प्रकृति का नियम है कि :
“जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।
जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।”
(संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।)

वटवृक्ष बेशक दीर्घायु विशाल वृक्ष है, तथापि इसे भी अमरत्व प्राप्त नहीं है। सियासत तो अनिश्चितताओं का खेल है। सियासत के वटवृक्ष भी ढहते देखे गए हैं। देश की बात करें तो भाजपा के संस्थापक सदस्य लाल कृष्ण आडवाणी को ही देख लीजिए। राजनीतिक वटवृक्ष हैं, लेकिन हाशिये पर हैं। प्रेम कुमार धूमल को सुजानपुर ने दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है। वीरभद्र सिंह बेशक अब तक मुख्य धारा में खड़े हैं, लेकिन परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। समय रहते समझना होगा कि अमर कोई भी नहीं, न राजनीति में न जीवन में! अतएव समय रहते ऐसा निर्णय ले लेना चाहिए, जिससे मान-सम्मान शिखर तक पहुंच जाए।

प्रदेश काँग्रेस का दुर्भाग्य यह रहा कि पंडित संत राम और चौधरी पीरू राम के अलावा अन्य सभी प्रदेश काँग्रेस अध्यक्षों के साथ वीरभद्र सिंह का मुख्यमंत्री रहते हुए छतीस का आंकड़ा बना रहा। स्व. सरला शर्मा, नारायण चंद पराशर, सत महाजन, ,विद्या स्टोक्स, कौल सिंह ठाकुर और अब सुखविंद्र सिंह सुक्खू तक से राजनीतिक मतभेद रहे। यह मतभेद सार्वजनिक भी हुए, जिससे चुनावों में नुक्सान उठाना पड़ा। यह कुश्ती सरकार खोने के बावजूद आज भी सार्वजनिक तौर पर जारी है।

मुकेश अग्निहोत्री को काँग्रेस विधायक दल का नेता बनवाकर वीरभद्र सिंह ने प्रदेश को एक अच्छा सन्देश दिया है, हालांकि 21 में से 18 विधायक राजा के पक्ष में खड़े थे। यदि जिद्द पकड़ लेते तो खुद बन जाते, लेकिन संदेश खराब चला जाता। जो छह बार सीएम रह चुका हो उसके सियासी कद के आगे विधायक दल के नेता का पद मामूली है। वीरभद्र सिंह का जीवन और राजनीति का अनुभव विशालतम है। अब राजनीति में बच्चों का मार्गदर्शन करना चाहिए। वीरभद्र सिंह 1993 से कह रहे हैं कि आत्म कथा लिखेंगे, पर इन्हीं व्यस्तताओं के कारण लिख नहीं सके। समय आ गया है कि कम्बल छोड़ दें, लम्बा संघर्ष हो गया। सब “सियासी स्यापों” को नौजवान हाथों में सौंप कर आत्मकथा लिखें। शांता जी ने “अधूरे सफर की पूरी कहानी” लिखी थी, आप “पूरे सफर की पूरी कहानी” देश को सुना दें। यह आत्मकथा अद्भुत होगी और सियासतदानों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का काम करेगी।

हमें नहीं मालूम कि वीरभद्र सिंह इस राय को किस नजरिये से लेंगे। उनका स्वभाव पल में तोला तो पल में माशा है। उन्हें स्मरण होगा कि हम 1982 में जब पत्रकारिता करने शिमला आये तो वे स्व. इंदिरा गाँधी मंत्रिमंडल में केंद्रीय उद्योग राज्य मंत्री थे। जब शिमला आते तो तब की ठाकुर राम लाल सरकार उन्हें प्रोटोकॉल के अनुसार तवज्जो नहीं देती थी। इस उपेक्षा के लिए हम हर बार राज्य सरकार के खिलाफ खबरें छापते, लेकिन कभी सीधे वीरभद्र सिंह के साथ नहीं मिले। 1983 में अचानक एक घटनाक्रम में राजा साहब मुख्यमंत्री बन गए। तभी तो कहता हूं कि राजनीति में कब क्या हो जाये, किसीको खबर नहीं।

1982 में बिना मिले हम वीरभद्र सिंह के शुभचिंतक बनकर उनके पक्ष और तब की कांग्रेस सरकार के विरोधी हो गए थे। पर जब 1983 में वीरभद्र सिंह सीएम बने तो हमने एक निर्णय पर उनके खिलाफ झंडा उठा लिया, क्योंकि हमारी दृष्टि में उनका वह निर्णय गलत था। सरकार ने अचानक एक ऐसे वरिष्ठ पुलिस ऑफिसर को सस्पेंड कर दिया, जो गुनहगार नहीं था। बाद में यह साबित भी हो गया। कहने का तात्पर्य यह कि हमने पत्रकारीय जीवन में कभी आँख मूंदकर किसीका समर्थन नहीं किया, वीरभद्र सिंह का भी नहीं ! यही कारण था कि उनके साथ धूप-छाँव का अपना यह रिश्ता चलता रहा। जैसे राजा साहब पल में तोला, पल में माशा, वैसे ही हम भी पल में रामराम, अगले पल श्यामाश्याम ! बहरहाल, वह पुलिस अधिकारी कौन था और क्यों सस्पेंड किया गया, यह कहानी जारी है………
साथ में हिमाचल काँग्रेस की कहानी भी….…

(वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण भानु की फेसबुक वॉल से)

 

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